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मानसिक द्वंद या कहे कि स्वयं के साथ एक लड़ाई।
एक ऐसा विषय जो की बड़ा ही तीक्ष्ण है। कई बार जो व्यक्ति हमसे कोई बात या इस समस्या के समाधान पर चर्चा करने का प्रयास भी करता है, तो हमारा गुस्सा उसी पर निकल जाता है। ये समस्या मुख्य रूप से आज कल युवा वर्ग के साथ सबसे ज्यादा है। क्योंकि आज कल की दिनचर्या, ओर उनके इस मानसिक द्वंद से बचने के प्रयास वास्तविकता में उन्हें ओर इस द्वंद के नजदीक ला कर खड़ा कर देते है। जैसे सोशल मीडिया ओर नेटवर्किंग, पर मानसिक तनाव को कम करने का प्रयास जो सिर्फ एक समय मात्र के लिए इन सभी तनाव ओर द्वंद से मुक्ति दिलाते है। ओर वापस एक अत्यंत जटिल मानसिक स्थिति में लाकर वापस खड़ा कर देते है। क्योंकि वो मानसिक द्वंद का कारण नहीं समझ पाते। वास्तविकता यह है की इन मानसिक द्वन्द का कारण
वैयक्तिक, आंतरिक एवं बाहरी कुछ भी हो सकते हैं। वैयक्तिक कारण में आपका स्पष्ट जीवन दर्शन ना होना, जिस वजह से आपके व्यवहार में असुरक्षा की भावना, निम्न आत्म विश्वास ओर अभ्यास में कमी।
मानसिक द्वंद के कुछ बाहरी कारण, जैसे किसी पुराने अनुभव के कारण, पेशे के कारण, या किसी दुर्घटना के कारण, हो सकता है। जिस कारण आपके व्यवहार में, व्यक्तित्व में विकार उत्पन्न हो जाता है। जिसके
कारण आपके अंदर चिंता, आपके व्यवहार में मनोवैज्ञानिक जटिलता चिड़चिड़ाहट का बने रहना,
बोरियत महसूस करना, डर, परिस्थितियों से भागना , रिश्तो से भागना, और अपने निर्णय में भटकाव,
स्वयं में भटकाव को खोज के रूप और स्वयं को खोजी की तरह परिभाषित करना , ये भी अस्पष्ट
सम्प्रत्यों के कारण होता है भटकाव से जूझ
रहे व्यक्ति में तनाव और भागने का भाव होता है
और एक खोजी व्यक्ति में जिज्ञासा, परिस्थिति से लड़ने का सामर्थ्य अधिक होता
हैं, एक दम से कल्पना करना, रुचि में परिवर्तन।
अधिकतर इनका विश्लेषण बड़ा ही जटिल होता है। जो की एक सामान्य व्यक्ति के लिए किसी विशेषज्ञ की अनुपस्थिति के बिना संभव नहीं हो पाता। क्योंकि यह मानव स्वभाव ही है । जो हमे स्वयं को जानने से रोकता है, निर्णय सामने आने पर भी निश्चितता को चयन नहीं करने देता। उसका कारण स्वयं के बारे अनुभव से उपजा निम्न आत्म विश्वास जो की उसे स्वयं में असुरक्षा का भाव पैदा करता है। ओर फिर एक तनाव पूर्ण स्थिति जिसे मानसिक द्वंद कहा जाता है। वास्तविकता में स्वयं से लड़ाई या मानसिक द्वंद, स्वयं के द्वारा निर्णय ना ले पाने की स्थिति होती है। कुछ तलाशना, चिंतन, निम्न आत्म विश्वास, निर्णय क्षमता में कमी, स्वभाव में त्वरित परिवर्तन इसके प्रमुख लक्षण है। कई बार अनिंद्रा, पारस्परिक विवाद, ओर सबसे अधिक क्रोध पर अनियंत्रण, प्रमुख लक्षण है। सबसे ज्यादा इसका प्रभाव व्यक्ति की निजी जीवन पर दिखता है, जब उसका ये मानसिक द्वंद उसे अपनो से दूर करने लगता है। ओर इन मानसिक द्वंद से जूझने वाला व्यक्ति जब तक इन्हे समेटता है। तब तक उसके जीवन के बाकी लोग भी काफ़ी दूर हो चुके होते है। जिस कारण वो अवसाद में घिर जाता है। जो की एक बड़ी नाजुक स्थिति हो जाती है। प्रमुख रूप से इन मानसिक द्वंद से जूझ रहे व्यक्ति का इसका प्रभाव उसके माता पिता, भाई बहन, ओर वैवाहिक जीवन पर सबसे ज्यादा पड़ता है। क्योंकि मुख्य रूप से ये ही लोग उसके इस समस्या का सामाधान होते है। लेकिन मानसिक द्वंद के कारण वश वैचारिक मत भेद होते है। ओर फिर से वो ही प्रक्रम शुरू। वास्तविकता ये है कि मानसिक द्वंद को पूर्ण रूप से स्पष्ट करने के लिए इसे समझना अत्यंत जरूरी है। की ये मेरी वैचारिक बिखराव, असुरक्षा ओर उसे बने निम्न आत्म विश्वास के कारण है ना कि परिस्थितिगत। परिस्थितिगत, शब्द का आशय
को स्पष्ट करना जरूरी है, की मानसिक द्वन्द से पीड़ित व्यक्ति का मानना की “मैं
ऐसा ही हूँ और इसमें परिवर्तन नहीं कर सकता”
वास्तविकता में, आपके जड़ स्वभाव को बताता है, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र और संबंधों
के लिए प्रयासरत होना ही मानव स्वभाव का प्रकृति प्रदत्त गुण है। वापस हम अपने विषय
पर आते हैं क्योंकि ये मानसिक द्वंद पुराने अनुभवों को लाद कर आगे बढ़ने से है। जबकि अनुभव का कार्य आपके निर्णय को ओर व्यवस्थित करना। लेकिन जब अनुभव लदे होते हैं तो ये अनिश्चितता की ओर ले जाते है। अर्थात अनुभव व्यक्ति को यदि सकारात्मक पथ नहीं दिखा पा रहे है, तो आपको अपने प्रत्यक्षण, अनुभव पर विचार की आवश्यकता है।
ये बड़ा ही हास्यास्पद है, लेकिन मेरे अनुभव में मैंने ऐसे कई लोगो को देखा हैं, जो अपने द्वन्द के लिए एक ऐसा परामर्श दाता का चयन करते है, जो खुद के जीवन में काफी सारे द्वन्द और सामाजिक समस्या से लड़ रहे होते है, ऐसे परामर्शदाता का चयन वास्तविकता में आपके द्वारा सहानुभूति के आधार पर ही हुआ है। तथा ऐसे व्यक्ति के द्वारा उचित परामर्श नहीं दिया जा सकता और उनके द्वारा दिए गए सुझाव और चर्चा आपकी समस्या के लिए उत्प्रेरक का काम कर सकती है
इसे सुलझाया कैसे जाएं ? सीधे शब्दों में कहे तो खुद को समझ नहीं पाना, स्वयं के व्यवहार को नहीं समझ पाना ही है मानसिक द्वंद। बड़ा आसान है। जैसे जैसे हम अपने व्यवहार के कारण को उनके पीछे के तथ्य को समझते है, उनमे सुधार करने का निश्चय करते है, और एक प्रायोगिक जीवन को शुरू करते है वैसे ही हमे इन मानसिक द्वन्द में कमी दिखती हैं यदि द्वंद को समझ लिया जाए तो द्वंद जब अनिश्चिता से उपज रहा है । तो जब आप अपने जीवन में निश्चितता की एक सूची बना कर उनके तरफ प्रयास प्रारंभ कर दें, तो आपके अंदर उपजे द्वंद, हर एक सफल निर्णय के साथ समाप्त होते जाएंगे। जो आपके मनोबल को भी विकसित करेंगे। इसमें आपको एक झोखिम लगेगा जरूर लेकिन, आपको एक सकारात्मक रवैया अपनाने का अभ्यास करना होगा। इस अभ्यास से मतलब एक प्रायोगिक जीवन। एक कड़ा अनुशासन, अपने आराम का त्याग। वास्तविकता को स्वीकारना। एक सरल उदहारण, के मेरे बाद मेरे परिवार का क्या होगा। इस चिंता में परिवार से बाहर ना निकलना। ओर नए सम्बन्धों को पुराने सम्बन्ध के खतम हो जाने का कारण समझना । जिसे नए सम्बन्धों का हम स्वागत ही नहीं करते। उनकी चिंता में स्वयं को अकेला रखना। ओर पुनः एक समय गुजर जाने पर आपको अकेला कर सकता है। इसलिए समय के साथ आपको मानसिक द्वंद समाप्त करना भी है तो उसके लिए आपको निश्चित स्थिति कि ओर चलना होगा। जो की आप में एक संतुलित मानसिक स्थिति को परिचित करेगा ओर आपको इन मानसिक द्वंद से मुक्ति दिलाएंगे। आप चाहे तो इन तथ्य को अपने जीवन में प्रायोगिक दृष्टि से अपनाए । आपको सफलता अवश्य मिलेगी। और अन्य किसी भी
सहायता के लिए आप हमसे संपर्क कर सकते है ।
2 Comments
Unknown
June 23, 2020Great to read sir…Ali
Garv Jani
June 26, 2020thank you So much sir